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निठारी केस: 16 मामलों में एक-एक कर कैसे बरी हो गया था सुरेंद्र कोली, मरने से 10 महीने पहले हुआ था पूरी तरह बेदाग

निठारी कांड का नाम एक बार फिर चर्चा में है. इस केस के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की मौत के बाद उसकी पूरी कानूनी कहानी सामने आ रही है. आइए, जानें इस मामले में कब, किस कोर्ट ने सुरेंद्र को क्या सजा सुनाई.

Gaurav Dwivedi
September 18, 2026
6 min read
निठारी केस: 16 मामलों में एक-एक कर कैसे बरी हो गया था सुरेंद्र कोली, मरने से 10 महीने पहले हुआ था पूरी तरह बेदाग

देशभर में अपराध के कई मामलो सामने आते रहते हैं, लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनको काफी वक्त भी गुजर गया जाए लेकिन वो लोगों की जहन से निकल नहीं पाता है. ऐसा ही केस था निठारी हत्या कांड, सालों पुराना केस को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हुई है और इसकी वजह सुरेंद्र कोली है, जिसे इस केस का आरोपी बताया गया था. दरअसल, हाल ही में सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत हो गई है. उसका शव फंदे से लटका मिला.निठारी कांड का नाम सुनते ही सुरेंद्र कोली का नाम सामने आता है. करीब 20 साल पहले हुए इस मामले ने पूरे देश को हिला दिया था. सुरेंद्र कोली को इस मामले से जुड़े अलग-अलग मामलों में कई बार मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन बाद में अदालतों ने कई मामलों में उसे बरी कर दिया. नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आखिरी मामले में भी कोली को बरी कर दिया, जिसमें उसकी सजा बरकरार थी. बताया जा रहा है कि पिछले कुछ महीनों से सुरेंद्र हरिद्वार में चाय की दुकान चला रहा था.

सुरेंद्र कोली पर दर्ज थे 19 मामले

शुरुआती तौर पर जांच में इसे आत्महत्या का मामला बताया जा रहा है, लेकिन पुलिस अभी इस मामले में छानबीन कर रही है. निठारी मामले के बाद से ही सुरेंद्र लोगों की बीच सुर्खियां बटोरने लगा था, निठारी मामले की जांच के बाद उस पर कई हत्याओं के आरोप लगे. सुरेंद्र पर कुल 16 मामलों में मुकदमे चले. इनमें से तीन मामलों में ट्रायल कोर्ट ने उसे बरी कर दिया, जबकि 13 मामलों में उसे दोषी ठहराकर मौत की सजा सुनाई गई.

सुरेंद्र कोली के केस की टाइमलाइन?

  • मामले की जांच शुरू की गई और ये मामला CBI के पास चला गया. जांच के बाद मई 2007 में सीबीआई ने गाजियाबाद की अदालत में इस मामले में पहली चार्जशीट दाखिल की. इसमें मोनिंदर सिंह पंढेर पर हल्के आरोप लगाए गए, जबकि सुरेंद्र कोली पर दुष्कर्म, अपहरण और हत्या के गंभीर आरोप लगाए गए. 13 फरवरी 2009 को गाजियाबाद की अदालत ने पहले मामले में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को मौत की सजा सुनाई. इसके बाद अलग-अलग मामलों में भी सुरेंद्र को मौत की सजा मिलती रही.

  • गाजियाबाद अदालत के सजा सुनाने के 7 महीने बाद मोनिंदर सिंह पंढेर को हाई कोर्ट ने मौत की सजा से बरी कर दिया. मोनिंदर के बाद सुरेंद्र के मामलों में से एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी 2011 को उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा बरकरार रखी. बाद में उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हुई. इसके बाद साल 2014 में सुरेंद्र की दया याचिका को तत्तकालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खारिज कर दी थी.

  • 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र की जिस एक सजा को बरकरार रखा था, उस मौत की सजा पर अमल नहीं हो सका. 29 जनवरी 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दया याचिका पर फैसला लेने में हुई लंबी देरी को आधार बनाकर उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया. इसके बाद भी बाकी मामलों में कानूनी लड़ाई जारी रही. 26 मार्च 2021 को गाजियाबाद की अदालत ने 13वें मामले में भी कोली को बरी कर दिया.

  • 16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निठारी हत्याकांड से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया. कोर्ट ने सबूतों और जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए. इन मामलों में उसे पहले मौत की सजा सुनाई गई थी. इसके बाद CBI और पीड़ित परिवारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने CBI और पीड़ितों की ओर से दायर अपीलों को खारिज कर दिया और 12 मामलों में कोली की बरी होने की स्थिति बरकरार रखी. कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया जिससे उसे पलटा जा सके.

  • इसके बाद एक मामला ऐसा बचा था, जिसमें 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी. 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव याचिका पर फैसला देते हुए उस आखिरी मामले में भी कोली को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि बाकी मामलों में उसी तरह के सबूतों के आधार पर बरी किए जाने के बाद सिर्फ एक मामले में उसकी सजा बनाए रखना उचित नहीं होगा. इसके बाद अदालत ने उसे रिहा करने का आदेश दिया.

  • इस मामले में पुलिस की क्या कमी सामने आई

    • पुलिस के सामने कबूलनामे पर सवाल

    कोली का 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज कबूलनामा अभियोजन के लिए अहम सबूत था. लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि कबूलनामा दर्ज होने से पहले कोली करीब 60 दिन तक लगातार पुलिस हिरासत में था. उसे वकील से ठीक तरह से मिलने का मौका भी नहीं मिला था. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कबूलनामे में खुद टॉर्चर और ट्यूटरिंग यानी जवाब सिखाए जाने जैसे संकेत थे. इसलिए कोर्ट ने कबूलनामे को भरोसेमंद नहीं माना.

    • जिस जगह से हड्डियां मिलीं, वह कोली के कब्जे में नहीं थी

    पुलिस ने कोली की निशानदेही पर लड़कियां और बच्चे के कंकाल मिलने की बात कही थी. लेकिन हाईकोर्ट ने इस बरामदगी पर भी सवाल उठाया. जिस जगह से हड्डियां मिली थीं, वह खुली सर्विस लेन थी. वह जगह सिर्फ कोली के नियंत्रण में नहीं थी. इसके अलावा पुलिस और वहां मौजूद लोगों को पहले से पता था कि उस जगह पर मानव अवशेष मिले हैं और खुदाई भी शुरू हो चुकी थी. इसलिए इसे उसकी विशेष जानकारी के आधार पर हुई बरामदगी नहीं माना जा सकता.

    • घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया गया

    • सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में जांच की कमियों को काफी गंभीर माना. कोर्ट के मुताबिक, खुदाई शुरू होने से पहले घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया गया था. इससे महत्वपूर्ण सबूतों के खराब होने या उनके साथ छेड़छाड़ की संभावना पैदा हुई. कोर्ट ने यह भी कहा कि बरामदगी की जानकारी को उसी समय सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया और पुलिस की रिमांड से जुड़े दस्तावेजों में भी अलग-अलग बातें सामने आईं.

      • मामले में मिले फॉरेंसिक सबूतों की कमी

      अगर हत्या घर के अंदर हुई थी, तो वहां खून के निशान, मानव अवशेष या दूसरे फॉरेंसिक सबूत मिलने की उम्मीद थी. लेकिन कोर्ट ने पाया कि पंढेर के घर के अंदर ऐसे पर्याप्त फॉरेंसिक सबूत नहीं मिले, जो कोली को हत्याओं से सीधे जोड़ सकें.

      • दूसरे एंगल की जांच भी पूरी तरह नहीं की

      सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी सामने आया कि जांचकर्ताओं ने घर और आसपास के लोगों से पर्याप्त पूछताछ नहीं की. इसके अलावा ऑर्गन ट्रेड यानी मानव अंगों की तस्करी के एंगल की भी पर्याप्त जांच नहीं की गई, जिसका जिक्र एक सरकारी समिति ने किया था.

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