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दतिया उपचुनाव में बीजेपी को हराने वाले कांग्रेस नेता घनश्याम सिंह के बारे में जानिए

दतिया उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने जीत दर्द की है. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को शिकस्त दी. घनश्याम दतिया राजघराने के मुखिया हैं. वो लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हैं.

Gaurav Dwivedi
August 3, 2026
3 min read
दतिया उपचुनाव में बीजेपी को हराने वाले कांग्रेस नेता घनश्याम सिंह के बारे में जानिए

दतिया विधानसभा उपचुनाव की चर्चा पूरे मध्य प्रदेश और देश में हो रही है. इस चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को करारी शिकस्त दी और अपनी ये सीट बरकरार रखी. बीजेपी ने इस सीट से आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा था, तो वहीं कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था. खास बात ये है कि वोटों की गिनती के दौरान घनश्याम सिंह लगातार बढ़त बनाए रहे और आखिरकार उन्होंने 6016 वोट से शानदार जीत दर्ज की. घनश्याम ने भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को हराया है. पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह भाजपा ने आशुतोष तिवारी को टिकट दिया था. घनश्याम सिंह की जीत से कांग्रेस समर्थकों में जश्न का माहौल है. मध्य प्रदेश में लगातार अपना जनाधार को खो रही कांग्रेस के लिए ये जीत किसी संजीवनी से कम नहीं है. आइये जानते हैं कौन हैं घनश्याम सिंह.घनश्याम सिंह मध्य प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम है जो दतिया और आसपास के इलाकों में लंबे समय से सक्रिय नेता के रूप में जाना जाता है. वो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं. वो एक ऐसे नेता के तौर पर जाने जाते हैं जो लोगों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखता है.

दतिया और सेवढ़ा विधानसभाओं में मजबूत पकड़

घनश्याम सिंह दतिया राजघराने के मुखिया हैं. वो लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हैं. एक जमीनी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले घनश्याम सिंह भाषण देने में माहिर हैं. उनकी दतिया और सेवढ़ा विधानसभाओं में खासी पकड़ है. उन्होंने सालों की मेहनत कर अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार की.

घनश्याम सिंह का राजनीतिक सफर

घनश्याम सिंह के राजनीतिक सफर की बात करें तो ये काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वो दतिया से दो बार और सेंवढ़ा से एक बार विधायक रह चुके हैं. उन्होंने पहली बार 1993 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी. इसके बाद 1998 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था. 2003 में एक बार फिर उन्होंने जीत दर्ज की और विधायक बने थे. 2008 में वो बीजेपी के उम्मीदवार नरोत्तम मिश्रा से हार गए. वहीं 2013 में उन्हें बीजेपी के प्रदीप अग्रवाल ने हराया. इसके बाद साल 2018 में वो सेवढ़ा विधानसभा से चुनाव लड़े और बीजेपी के राधेलाल बघेल को हराकर विधायक बने. 2023 में सेंवढ़ा से उन्होंने फिर चुनाव लड़ा, लेकिन वो बीजेपी के उम्मीदवार प्रदीप अग्रवाल से हार गए.

पार्टी को मजबूत करने पर जोर

हार के बावजूद घनश्याम सिंह ने पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया. उन्होंने संगठन और जनता के बीच अपनी सक्रियता जारी रखी. उनकी राजनीतिक सक्रियता दतिया तक सीमित नहीं रही. उन्होंने सेवढ़ा विधानसभा क्षेत्र में भी लंबे समय तक काम किया और वहां से चुनाव भी जीते. दोनों क्षेत्रों में उनका नाम आज भी प्रभावशाली नेताओं की सूची में शामिल है. शायद यही वजह रही, जब दतिया से कांग्रेस के विधायक राजेंद्र भारती को एक केस में सजा मिली और उनकी सदस्यता गई तो इस सीट पर उपचुनाव के लिए पार्टी ने घनश्याम को चुना.

कांग्रेस की उम्मीदों पर उतरे खरे

दतिया उपचुनाव में कांग्रेस के सामने मजबूत उम्मीदवार चुनने की चुनौती थी. ऐसे में पार्टी ने ऐसे नेता को मैदान में उतारने का फैसला किया, जिसकी क्षेत्र में पहले से मजबूत पहचान हो. घनश्याम सिंह इस कसौटी पर खरे उतरे, सालों से संगठन के साथ जुड़े रहने के कारण पार्टी नेतृत्व को उन पर भरोसा जताया और ये भरोसा आखिरकार जीत में बदल गया. इससे पार्टी को बड़ी राहत मिली है और समर्थकों का जोश भी हाई है.

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