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केंद्र की आलू खरीद कीमत पर विवाद, किसान बोले—लागत से आधी दर पर कैसे टिकेगी खेती?

केंद्र की आलू खरीद कीमत पर किसानों का विरोध, लागत से आधी दर पर खेती संभव नहीं, प्रदर्शन की तैयारी।

admin
April 19, 2026
3 min read
केंद्र की आलू खरीद कीमत पर विवाद, किसान बोले—लागत से आधी दर पर कैसे टिकेगी खेती?

उत्तर प्रदेश में आलू किसानों के लिए केंद्र सरकार का हालिया फैसला राहत और असंतोष—दोनों लेकर आया है। केंद्र ने 2025-26 सीजन के लिए 20 लाख मीट्रिक टन आलू खरीदने की मंजूरी दी है, लेकिन तय की गई कीमत ₹6,500.90 प्रति टन (करीब ₹6.5 प्रति किलो) पर किसान संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि यह दर मौजूदा उत्पादन लागत से लगभग आधी है।

खरीद को सराहा, कीमत पर नाराजगी

किसान संगठनों ने खरीद की मात्रा को सकारात्मक कदम बताया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह राहत अधूरी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कन्नौज, फिरोजाबाद और आगरा जैसे प्रमुख आलू उत्पादक इलाकों से आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रति किलो उत्पादन लागत ₹12 तक पहुंच चुकी है।

एक किसान नेता ने कहा,

“जब लागत ही ₹12 प्रति किलो है, तो ₹6.5 में बेचकर किसान कैसे जिंदा रहेगा? मुनाफा तो दूर, लागत भी नहीं निकल रही।”

लागत बढ़ने के मुख्य कारण

विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार, आलू उत्पादन की लागत में तेज बढ़ोतरी के पीछे कई कारण हैं:

महंगे बीज और उर्वरक (डीएपी, एनपीके)

मजदूरी और सिंचाई खर्च में वृद्धि

कोल्ड स्टोरेज का भारी शुल्क (₹340–380 प्रति क्विंटल)

इन बढ़ते खर्चों के चलते किसानों का कहना है कि न्यूनतम ₹12 प्रति किलो तो सिर्फ लागत निकालने के लिए जरूरी है, जबकि ₹15 प्रति किलो पर ही उन्हें कुछ मुनाफा मिल सकता है।

सरकार का पक्ष: दाम गिरने से बचाने की कोशिश

यह खरीद मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (MIS) के तहत की जा रही है। कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

सरकार का कहना है कि इस साल बंपर उत्पादन और ओवर सप्लाई के कारण मंडियों में आलू के दाम तेजी से गिरे हैं। ऐसे में यह कदम किसानों को “डिस्ट्रेस सेलिंग” से बचाने के लिए उठाया गया है। इस योजना से सरकारी खजाने पर करीब ₹203 करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा।

जमीन पर हालात चिंताजनक

कई जिलों में किसान अपनी उपज को संभाल नहीं पा रहे हैं। कोल्ड स्टोरेज की लागत और गिरती कीमतों के चलते कुछ किसानों को फसल सड़कों पर फेंकने या बर्बाद करने तक की नौबत आ गई है।

पश्चिमी यूपी के एक किसान ने खबर युग से कहा,

“सरकार का कदम सही दिशा में है, लेकिन जब तक कीमत हकीकत के हिसाब से नहीं होगी, तब तक राहत नहीं मिलेगी।”

किसानों की प्रमुख मांगें

किसान संगठनों ने सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं:

न्यूनतम ₹12 प्रति किलो की गारंटी

₹15 प्रति किलो तक लाभकारी मूल्य

कोल्ड स्टोरेज चार्ज पर नियंत्रण

दीर्घकालिक समाधान जैसे प्राइस डिफिशिएंसी पेमेंट और स्टोरेज सब्सिडी

आगे क्या?

सरकारी खरीद केंद्र जल्द शुरू होने वाले हैं, लेकिन कीमत को लेकर विवाद बढ़ने की संभावना है। अगर मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो किसान संगठन आंदोलन तेज कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है, वहां यह मुद्दा लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में सरकार और किसानों के बीच इस पर सहमति बनती है या टकराव बढ़ता है—इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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